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माता और पिता चरणों में, हम सब शीश झुकाते हैं |
उनके ऋण से उऋण हो सके, प्रभु से यही मनाते हैं ||
माता और पिता से बढ़कर, कोई भी भगवान नहीं |
उनकी कृपा दृष्टि पाये बिन, संतति का कल्याण नहीं ||
मातृ तुल्य गुरु नहीं जगत में, नहीं पिता से बढ़ त्राता |
जिनके आशीषों से मानव, जीवन उन्नत बन पाता ||
प्राणों को देकर भी उनका, ऋण न कदापि चुका सकते |
बस कृतज्ञता ज्ञापित करके, अपना शीश झुका सकते ||
ईश्वर हमे शक्ति दे ऐसी, उनकी सेवा कर पायें |
कभी नहीं उनका ऋण भूलें, चाहें प्राण चले जाये ||
नोट: प्रत्येक छात्र/ छात्रा को कक्षाएं प्रारंभ होने के पूर्व होने वाली प्रार्थना सभा में नित्यप्रति उपस्थिति होना अनिवार्य है |
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